हस्तिनापुर में तीर्थंकर शांतिनाथ भगवान के जन्म एवं तप कल्याणक पर भव्य रथयात्रा

हस्तिनापुर – जैन कनेक्ट संवाददाता | हस्तिनापुर स्थित पावन जैन तीर्थ क्षेत्र में मंगलवार को तीर्थंकर शांतिनाथ भगवान के जन्म और तप कल्याणक के पावन अवसर पर भव्य रथयात्रा का आयोजन हुआ। श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर के त्रिमूर्ति जिनालय में विराजमान भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा के समक्ष चल रहे 40 दिवसीय शांतिनाथ विधान के अंतर्गत यह रथयात्रा निकाली गई, जिसमें श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला।

🚩 शुभारंभ शांतिनाथ विधान के अभिषेक से प्राचीन बड़ा मंदिर में शांतिनाथ भगवान के अभिषेक से दिन की शुरुआत हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित हुए।

🚕 भव्य रथयात्रा का आयोजन रथयात्रा नगर के मुख्य मार्गों से होती हुई पांडुकशिला तक पहुँची, जहां श्रीजी का विशेष अभिषेक संपन्न हुआ।

👑 धार्मिक पात्रों की विशेष भूमिका रथयात्रा में ख्वासी बनने का सौभाग्य रजनीश जैन, सारथी बनने का सौभाग्य मनीष जैन और कुबेर इंद्र बनने का सौभाग्य अशोक कुमार जैन को मिला।

🌺 चंवर ढुराने का विशेष सौभाग्य चंवर ढुराने का धर्मिक सौभाग्य मनीष जैन और प्रदीप जैन को प्राप्त हुआ, जो पूरे वातावरण को भक्तिमय बना गया।

💧 शांतिधारा में श्रद्धालुओं की सहभागिता पंडित शीलचंद जैन शास्त्री सहित कई श्रद्धालुओं ने शांतिधारा की, जिसमें बालक-बालिकाओं ने भी सक्रिय भागीदारी की।

🪔 प्रथम अभिषेक और पालना विधान बाबा शांतिनाथ का प्रथम अभिषेक खेमचंद पवन कुमार जैन परिवार द्वारा किया गया और श्रीजी को प्रथम पालना में विराजमान करने का सौभाग्य सीमा जैन को प्राप्त हुआ।

🎉 कल्याणक की आराधना और निर्वाण लाडू समर्पण भगवान शांतिनाथ के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर मंदिर में निर्वाण लाडू समर्पण किया गया और विशेष आरती हुई।

🎖 श्रद्धालुओं का सम्मान समारोह समिति पदाधिकारियों द्वारा माला और मुकुट पहनाकर श्रद्धालुओं का सम्मान किया गया, जिससे वातावरण आनंदमय हुआ।

🧘 मुनि भाव भूषण महाराज का प्रवचन मुनिश्री भाव भूषण महाराज ने शांतिनाथ भगवान के जीवन और मोक्ष यात्रा पर प्रकाश डालते हुए धर्म पालन का संदेश दिया।

🎶 सायंकालीन भजन संध्या और सांस्कृतिक कार्यक्रम कार्यक्रम के समापन पर भव्य आरती, भजन संध्या और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया।

इस आयोजन में 1270 परिवारों ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया और शांतिनाथ विधान के 23वें दिन को ऐतिहासिक बना दिया। पूरा वातावरण धर्म, भक्ति और संस्कारों से सराबोर रहा।

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