पुणे में जैन समाज ने छात्रावास भूमि की बिक्री के खिलाफ जताया विरोध

पुणे – जैन कनेक्ट संवाददाता | पुणे के प्रतिष्ठित शैक्षणिक केंद्र “शेठ हीराचंद नेमचंद डिंगबर जैन बोर्डिंग” की भूमि को निजी बिल्डर को बेचने के प्रस्ताव के खिलाफ जैन समाज एकजुट होकर विरोध में उतर आया है। पिछले 65 वर्षों से जैन छात्रों के लिए शैक्षणिक, मानसिक और सांस्कृतिक आधार रहा यह छात्रावास अब विवादों के घेरे में है, क्योंकि ट्रस्ट द्वारा इसे निजी विकास के लिए सौंपने की तैयारी की जा रही है।

इस निर्णय को लेकर पूर्व छात्रों और समाजजनों में गहरा आक्रोश है। वे इसे मूल शैक्षणिक उद्देश्य के विरुद्ध मानते हुए पुनर्विकास की मांग कर रहे हैं, न कि बिक्री की। समाज ने इसे लेकर चैरिटी कमिश्नर को ज्ञापन भी सौंपा है।

विरोध के मुख्य बिंदु 👇

📜 65 वर्षों की सेवा का इतिहास शेठ हीराचंद डिंगबर जैन बोर्डिंग 1960 से जैन छात्रों को शिक्षा एवं संस्कार का आधार देता आया है।

🏫 250 छात्रों की क्षमता वाला छात्रावास यह छात्रावास 3 एकड़ भूमि पर स्थित है और प्रतिवर्ष 250 छात्रों को आवास सुविधा देता है।

🚫 भूमि बिक्री का प्रस्ताव अस्वीकार्य पूर्व छात्रों ने प्रस्तावित बिक्री को मूल उद्देश्य के साथ विश्वासघात करार दिया है।

🏗️ पुनर्विकास, न कि व्यावसायीकरण समाज ने मांग की है कि भवन का पुनर्निर्माण किया जाए, लेकिन भूमि निजी बिल्डर को न दी जाए।

💰 सैकड़ों करोड़ की भूमि, पर पारदर्शिता नहीं समाज का आरोप है कि इस प्रमुख भूमि की बिक्री की प्रक्रिया जल्दबाज़ी और अपारदर्शी रही है।

📣 “हमें विकास चाहिए, बिक्री नहीं” इस नारे के साथ समाज के सदस्य एकजुट होकर आंदोलन चला रहे हैं।

📄 चैरिटी कमिश्नर को ज्ञापन ट्रस्ट के निर्णय के विरोध में एक स्वतंत्र जांच समिति गठित करने की मांग की गई है।

🧑‍🎓 पूर्व छात्रों की सक्रिय भागीदारी अक्षय जैन, आनंद कांकड़िया, पीयूष बाफना, संजय गांधी सहित अनेक पूर्व छात्र इस मुहिम में जुड़े।

🗣️ ट्रस्ट की सफाई ट्रस्टी चकोर गांधी ने बताया कि भवन जीर्ण अवस्था में है और नए निर्माण के लिए यह निर्णय लिया गया है।

🙏 भविष्य की बात: 250 छात्रों के लिए व्यवस्था ट्रस्ट ने आश्वासन दिया है कि नए भवन में भी 250 छात्रों की सुविधा सुनिश्चित की जाएगी।

यह मुद्दा केवल एक भवन की बिक्री नहीं, बल्कि एक संस्थान की परंपरा और उद्देश्य की रक्षा का है। जैन समाज ने एकजुट होकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि विकास होना चाहिए, लेकिन उसके मूल में सेवा और शिक्षा का भाव बना रहना चाहिए।

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