जिन धर्म ही सम्यकदर्शन का सच्चा मार्ग” – मुनि श्री विनंद सागरजी

आष्टा-जैन कनेक्ट संवाददाता | जिन धर्म ही ऐसा अमृतपान है, जो आत्मा को सम्यकदर्शन की ओर अग्रसर करता है। आष्टा के अलीपुर स्थित श्रीचंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री विनंद सागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को आत्म-जागृति का संदेश दिया। उन्होंने धर्म की उपमा एक बगीचे से दी, जिसे प्रेम, तपस्या और निरंतर साधना से सींचना आवश्यक होता है। धर्मसभा में उपस्थित मुनिश्री विश्रांत सागरजी ने भी महावीर स्वामी के सिद्धांतों पर चलने की प्रेरणा दी।

🌿 धर्म को बताया आत्मिक बगीचा मुनिश्री ने धर्म की तुलना उस बगीचे से की जिसे माली रोज पानी देकर सींचता है, और कहा कि यह बगीचा अब और भी विशाल हो चुका है।

🙏 जिन धर्म से ही संभव है सम्यकदर्शन सम्यकदर्शन प्राप्त करने का सबसे सटीक माध्यम जिन धर्म है — यही सच्चे तत्वों पर श्रद्धा और विश्वास का मार्ग है।

📚 तत्वज्ञान की कमी पर चिंता मुनिश्री ने कहा कि आज लोग तत्वों को ठीक से नहीं जानते, जिससे जीवन में धार्मिक संस्कारों का अभाव होता जा रहा है।

🙏 सच्चे श्रद्धान की पहचान सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति लगन ही वास्तविक श्रद्धा की पहचान है — इसे अपने जीवन में आत्मसात करना आवश्यक है।

🧘‍♂️ धर्म आराधना में लगाएं अधिक समय मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने समय का अधिकाधिक भाग धर्म आराधना में व्यतीत करें।

📿 कल्याण मंदिर स्तोत्र विधान की घोषणा विनंद सागर महाराज के सानिध्य में 14 मई को अलीपुर मंदिर में कल्याण मंदिर स्तोत्र विधान का आयोजन होगा।

🚶‍♂️ मुनि संघ का नगर में भव्य प्रवेश मुनि संघ का नगर में भव्य स्वागत किया गया, जिसमें समाजजनों ने इंदौर नाका से शोभायात्रा के रूप में अलीपुर मंदिर तक मुनियों का स्वागत किया।

🌟 विहार की अगली दिशा मुनि संघ का विहार अब अलीपुर से कोठरी की ओर हुआ, जिससे धार्मिक यात्रा को नया पड़ाव मिला।

🚩 श्रवण और साधना का संगम मुनिश्री विश्रांत सागरजी ने भगवान महावीर के बताए मार्ग पर चलने का आह्वान किया और आत्मकल्याण के लिए निरंतर साधना पर बल दिया।

📅 आगामी नगर प्रवेश की सूचना मुनिश्री श्रुतेश सागर और मुनिश्री सुश्रुत सागर 14 मई को जावर से नगर प्रवेश करेंगे, जिससे पुनः धर्मप्रेमियों को साक्षात दर्शन लाभ मिलेगा।

इस अवसर पर श्रद्धालुजन धर्मसभा में उपस्थित होकर मुनियों के वचनों से लाभान्वित हुए। सभा न केवल धार्मिक प्रेरणा का माध्यम बनी, बल्कि आत्मकल्याण की ओर एक सार्थक यात्रा की प्रेरणा भी दी।

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