मेंगलवा – जैन कनेक्ट संवाददाता | भांडवपुर जैन तीर्थ में चातुर्मास के अवसर पर आयोजित प्रवचन में जैनाचार्य जयरत्न सूरीश्वर महाराज ने जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम और जीवन के आध्यात्मिक उन्नयन का अवसर है। इस दौरान अनुयायियों को साधना, संयम और त्याग के माध्यम से जीवन को पवित्र बनाने की प्रेरणा दी जाती है।
🕊️ जैन धर्म का मूल भाव: जीवदया आचार्य ने कहा कि जीवदया न केवल दया का भाव है, बल्कि यह परोपकार का माध्यम भी है, जो लोक और परलोक दोनों को सुधार सकता है।
🪷 चातुर्मास: आत्मशुद्धि और संयम का कालचार महीनों तक जैन अनुयायी तप, उपासना और ध्यान के माध्यम से आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं।
🛐 पूजा और सत्संग से मिलता सद्मार्गमंदिरों में की जाने वाली पूजा-अनुष्ठान और संतों के प्रवचनों से जीवन में सदाचार और सत्य का संचार होता है।
😌 मनोरंजन से दूरी, आत्मसंयम का अभ्यास चातुर्मास में टीवी, कूलर, पंखा आदि सुविधाओं से दूर रहकर साधक आत्मनियंत्रण का पालन करते हैं।
🥗 शुद्ध व स्वदेशी आहार का सेवन इस अवधि में केवल घर पर बना सात्त्विक, शुद्ध और अहिंसक भोजन ग्रहण किया जाता है।
🧼 स्वच्छता और अनुशासन का विशेष महत्व शारीरिक और मानसिक शुद्धता के लिए स्वच्छता का कड़ाई से पालन किया जाता है।
🐜 हर जीव के प्रति करुणा जीव हत्या से बचने की प्रेरणा के साथ जीवन में करुणा और संवेदना का विस्तार किया जाता है।
🧘 जैन कुल नहीं, आचरण बनाता है सच्चा जैन आचार्य ने कहा कि जैन धर्म का पालन करने वाले को जीवन में सिद्धांतों को उतारना जरूरी है, केवल जन्म पर्याप्त नहीं।
🌟 सच्चा साधु वही जो करे समाज कल्याण जो व्यक्ति दूसरों के हित में कार्य करता है, वही सच्चे अर्थों में साधना और सिद्धि को प्राप्त करता है।
📜 महावीर परंपरा का उद्देश्य – नैतिकता और चेतना भगवान महावीर की परंपरा समाज में नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक जागरूकता फैलाने की प्रेरणा देती है।
जैनाचार्य जयरत्न सूरीश्वर महाराज ने अपने प्रवचन के माध्यम से जैन धर्म की गहराई, उसकी जीवदया, आत्मशुद्धि और अहिंसा की भावना को अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया। चातुर्मास के माध्यम से समाज में आध्यात्मिक उन्नयन और नैतिक मूल्यों के प्रचार का यह प्रयास निश्चित रूप से प्रेरणास्पद है।
Source : Dainik Bhaskar

Leave a Reply