जिन शासन की स्मृति में बड़वाह में स्थापना दिवस समारोह आयोजित

बड़वाह–जैन कनेक्ट संवाददाता | बड़वाह स्थित श्री विमलनाथ श्वेतांबर जैन मंदिर में गुरुवार को वैशाख शुक्ल ग्यारस के पावन अवसर पर स्थापना दिवस समारोह श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान महावीर की तपस्या, उनके ज्ञान प्राप्ति के क्षण और चतुर्विध संघ की स्थापना जैसे ऐतिहासिक प्रसंगों को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। समारोह का शुभारंभ अभिषेक और पूजन के साथ हुआ, जिसमें समाजजनों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

🛕 मंदिर में हुआ भगवान का अभिषेक सुबह 11 बजे भगवान विमलनाथ का मंगलमय अभिषेक एवं पूजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य लाभ अर्जित किया।

📜 भगवान महावीर के जीवन की स्मृति समारोह में भगवान महावीर के तपस्वी जीवन से जुड़े प्रसंगों का वर्णन किया गया, जिसमें उनके 11 लाख 85 हजार 645 मास की क्षमण यात्रा का उल्लेख हुआ।

🥣 तपस्या के दौरान केवल 349 दिन आहार श्रोताओं को बताया गया कि अंतिम जन्म में भगवान महावीर ने साढ़े बारह वर्षों की तपस्या के दौरान केवल 349 दिन ही आहार ग्रहण किया।

🧘 ज्ञान प्राप्ति की पावन तिथि वैशाख सुदी दशमी को भगवान महावीर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, जिसे जैन धर्म में अत्यंत पुण्य तिथि माना जाता है।

🕉️ चतुर्विध संघ की स्थापना लगभग 2580 वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल ग्यारस को भगवान महावीर ने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—इन चारों के चतुर्विध संघ की स्थापना की थी।

🚩 ध्वजारोहण से हुआ शुभारंभ मंदिर समिति के अध्यक्ष ईश्वर चंद्र दस्साणी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए धार्मिक ध्वज फहराया।

🤝 समिति पदाधिकारियों की सहभागिता समिति सचिव विमल बरडिया, विजय बाफना, कैलास बाफना सहित अन्य पदाधिकारी कार्यक्रम में मौजूद रहे और आयोजन को सफल बनाया।

👩‍🦰 महिलाओं की भी रही भागीदारी इंदु बाफना, शिखा बाफना, चित्रा दस्साणी और अमिता कोठारी ने उत्सव में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

🎉 समूहिक रूप से मनाया गया उत्सव समाज के सभी वर्गों ने मिलकर स्थापना दिवस को धार्मिक भावनाओं और एकता के साथ मनाया।

🎊 जिन शासन दिवस की शुभकामनाएं श्वेतांबर जैन श्री संघ द्वारा सभी समाजजनों को जिन शासन दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दी गईं।

इस धार्मिक आयोजन ने समाज को भगवान महावीर के आदर्शों की पुनः स्मृति दिलाई और चतुर्विध संघ की एकता व साधना के महत्व को उजागर किया। श्रद्धा, समर्पण और सामूहिकता के साथ मनाया गया यह उत्सव जैन परंपरा की गौरवशाली धरोहर को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बना।

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