श्री देलवाड़ा जैन तीर्थ, माउंट आबू में वार्षिकोत्सव एवं ध्वजा महोत्सव सम्पन्न

माउंट आबू – जैन कनेक्ट संवाददाता | भारत के पंचमहातीर्थों में प्रमुख माने जाने वाले श्री देलवाड़ा जैन तीर्थ, माउंट आबू में 993वें वार्षिकोत्सव एवं ध्वजारोहण महोत्सव का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। तीन दिवसीय इस आध्यात्मिक आयोजन में देशभर से आए 850 से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धर्म और संस्कृति के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

इस भव्य आयोजन की अध्यक्षता जैन संतों की विशिष्ट निश्रा में हुई। समारोह में भव्य पूजन, दिव्य अभिषेक, पारंपरिक रचनाएं, अंगरचना, भजन एवं आरती जैसे कार्यक्रमों ने तीर्थ स्थल को भक्ति-भाव से आलोकित कर दिया।

🔹 महोत्सव की प्रमुख झलकियां:

📿 तीन दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ महोत्सव की शुरुआत लूणवसही एवं पित्तलहार जिनालयों में 18 विशेष अभिषेकों से हुई, जिसमें पंचामृत और सुगंधित औषधियों से पूजन सम्पन्न हुआ।

🧘 संतों की निश्रा में आयोजन पूज्यपाद आ. देव श्री दिव्येश चंद्र सागर सूरीजी म.सा. समेत अनेक संतों की शुभ निश्रा में यह आयोजन धर्म भाव से सम्पन्न हुआ।

🎶 संगीतमय पूजन ने मोहा मन सागरभाई और विलेश शाह के मंत्रोच्चारण व संगीतमय प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं को भक्ति भाव में डुबो दिया।

🪔 “देलवाड़ा बुलावे छे” भक्ति कार्यक्रम संध्या आरती के उपरांत हुए इस कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

🛕 द्वितीय दिवस के विशेष अभिषेक विमलवसही, महावीर स्वामी और खरतरवसही जिनालयों में भी 18-18 दिव्य अभिषेकों का आयोजन हुआ।

🌟 अंगरचना एवं गौरवगाथा वडोदरा के आंगी दर्शन ग्रुप द्वारा भगवान आदिनाथ की अंगरचना प्रस्तुत की गई और गौरांग शाह ने तीर्थ की गौरवगाथा साझा की।

🚩 115 शिखरों पर ध्वजारोहण अंतिम दिन तीर्थ के 115 शिखरों पर विधिपूर्वक ध्वजारोहण सम्पन्न हुआ, जिसमें अनेक लाभार्थियों ने भाग लिया।

🙏 श्रद्धालुओं के लिए उत्तम व्यवस्था श्री नगराजजी (अहमदाबाद) और टीम द्वारा तीनों दिन सात्विक भोजन की उत्तम व्यवस्था की गई।

🧑‍🤝‍🧑 150 युवाओं की सेवा भावना आबू भक्ति परिवार के 150 युवाओं ने पूरे आयोजन में निःस्वार्थ सेवा देकर आयोजन को सफल बनाया।

🎉 सहस्त्राब्दी महोत्सव की घोषणा पेढ़ी द्वारा विमल वसही जिनालय के 1000 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में सहस्त्राब्दी महोत्सव की आगामी योजना की जानकारी दी गई।

यह महोत्सव न केवल धार्मिक आयोजन था, बल्कि जैन संस्कृति, परंपरा और एकता का प्रतीक बनकर उभरा। श्रद्धालुओं का उल्लास, संतों की निश्रा और सेवा भाव ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

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