पाली – जैन कनेक्ट संवाददाता | पाली शहर में एक गहरे शोक का माहौल तब पसर गया जब जैन संत आचार्य पुंडरिक रत्न सूरीश्वरजी (70) का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। गुरुवार सुबह उनकी पार्थिक देह को विवेकानंद सर्किल के पास स्थित समुद्र विहार से वैकुंठी के लिए रवाना किया गया, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु जयकारों के साथ अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
इस भावुक अंतिम यात्रा का समापन मानपुरा भाकरी स्थित श्री जीरावला पार्श्वनाथ जैन मंदिर परिसर में हुआ, जहां संत का अंतिम संस्कार किया गया। मुंबई से लेकर गुजरात और महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग आचार्य को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
🔹 प्रस्तुत हैं इस घटनाक्रम से जुड़े प्रमुख तथ्य:
🛻 हादसे में सिर पर गंभीर चोट शिवपुरा थाना क्षेत्र में एक मिनी ट्रक ने जानबूझकर हाईवे से नीचे आकर आचार्यजी को टक्कर मार दी, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई।
🕯️ विवेकानंद सर्किल से निकली वैकुंठी पाली शहर के समुद्र विहार से सुबह वैकुंठी निकली, जिसमें समाजजनों ने संत के जयकारे लगाए और पैदल यात्रा की।
🙏 मानपुरा भाकरी में हुआ अंतिम संस्कार संत की पार्थिक देह को श्री जीरावला पार्श्वनाथ जैन मंदिर लाया गया, जहां मंदिर की भूमि पर अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
👁️ नम आंखों से दी अंतिम विदाई आचार्यजी के प्रति गहरी श्रद्धा और भावनात्मक लगाव के कारण कई श्रद्धालु नम आंखों से अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
🏛️ मंदिर निर्माण की योजना संत की स्मृति में भविष्य में उसी स्थान पर मंदिर बनाने की घोषणा की गई है, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ।
📜 मुखाग्नि, कंधा, शॉल व लोठिया की बोलियां समुद्र विहार में संत की पार्थिक देह को मुखाग्नि देने और अन्य विधियों की बोलियों में समाजबंधुओं ने सहभागिता की।
🌍 देशभर से पहुंचे श्रद्धालु गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से सैकड़ों श्रद्धालु संत की अंतिम यात्रा में भाग लेने विशेष रूप से पाली पहुंचे।
🧘♂️ 28 जनवरी 1986 को ली थी दीक्षा आचार्य पुंडरिक रत्न सूरीश्वर ने गुजरात के पालिताणा में 1986 में दीक्षा ली थी और 2020 में उन्हें आचार्य पदवी मिली थी।
📚 18 भाषाओं के ज्ञाता संतजी को 18 भाषाओं का ज्ञान था और उन्होंने अनेक प्राचीन जैन ग्रंथों व पांडुलिपियों का संरक्षण किया।
⚖️ हादसे में दर्ज हुई FIR शिष्य मुनि महाविदेह विजय ने रिपोर्ट दर्ज कर ट्रक चालक पर जानबूझकर दुर्घटना करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है।
जैन संत आचार्य पुंडरिक रत्न सूरीश्वरजी का देवलोक गमन न केवल जैन समाज बल्कि पूरे संत समुदाय के लिए एक गंभीर क्षति है। धर्म, साधना और ग्रंथों के प्रति उनका योगदान अमिट रहेगा। पाली की धरती ने एक आध्यात्मिक रत्न को विदाई दी है, लेकिन उनकी शिक्षाएं और स्मृतियां जनमानस में सदा जीवित रहेंगी।

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