मुंबई – जैन कनेक्ट संवाददाता | महाराष्ट्र सरकार की FYJC (कक्षा 11वीं) प्रवेश नीति में किए गए संशोधन को लेकर जैन अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों ने बॉम्बे हाईकोर्ट और उसकी नागपुर खंडपीठ में याचिकाएं दाखिल की हैं। इन याचिकाओं में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण को उनके गैर-अल्पसंख्यक सीटों में लागू किए जाने पर आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं ने इस निर्णय को “अन्यायपूर्ण” और “असंवैधानिक” करार दिया है।
⚖️ बॉम्बे हाईकोर्ट और नागपुर बेंच में याचिका मुंबई और नागपुर स्थित चार जैन शिक्षण संस्थानों ने सामाजिक आरक्षण के विरुद्ध उच्च न्यायालय में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कीं।
🏫 प्रभावित संस्थान करंजा एजुकेशन सोसायटी-वाशिम, सीताबाई सांगाई एजुकेशन सोसायटी-अमरावती, श्री महावीर शिक्षण प्रसारक मंडल और सोलापुर की एपीडी जैन पाठशाला शामिल हैं।
📉 सीटों की ग़लत गणना का आरोप मुंबई के तीन प्रमुख कॉलेजों ने प्रबंधन और इन-हाउस कोटे की ग़लत गणना का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे उनकी कुल सीटों में भारी कटौती हुई है।
📜 मई 6 का जीआर बना विवाद की जड़ शिक्षण संस्थानों का कहना है कि 6 मई को जारी सरकारी आदेश (GR) स्पष्ट नहीं करता कि सामाजिक आरक्षण गैर-अल्पसंख्यक सीटों पर कैसे लागू होगा।
📚 पिछले वर्ष तक नहीं था आरक्षण संस्थानों ने तर्क दिया कि FYJC प्रवेश में पहले अल्पसंख्यक संस्थानों पर सामाजिक आरक्षण लागू नहीं होता था, और यह बदलाव अचानक किया गया है।
🧑🏫 ईसाई संस्थान भी साथ आने को तैयार नागपुर के ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान भी इस याचिका में शामिल होने या अलग याचिका दायर करने पर विचार कर रहे हैं।
🌐 केंद्रीयकृत पोर्टल से चला पता mahafyjcadmissions.in पोर्टल पर प्रकाशित सीट मैट्रिक्स से संस्थानों को नई नीति की जानकारी मिली, जिससे असंतोष बढ़ा।
📣 पुरानी नीति की बहाली की मांग संस्थानों ने कोर्ट से पुरानी प्रवेश नीति को बहाल करने, या GR को संशोधित करने की अनुमति मांगी है।
🚫 सरकार की सफाई शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि अल्पसंख्यक कोटे की सीटों पर कोई आरक्षण लागू नहीं हुआ है, बल्कि यह केवल रिक्त सीटों पर लागू होगा।
🌍 सकारात्मक भेदभाव पर सरकार अडिग अधिकारियों का कहना है कि यह पहल पिछड़े वर्ग के छात्रों को प्रमुख संस्थानों में अवसर देने हेतु की गई है।
इस विवाद ने राज्य के अल्पसंख्यक संस्थानों में FYJC प्रवेश को लेकर चिंता और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। अब यह देखना होगा कि न्यायालय इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है, क्योंकि इससे हजारों छात्रों और संस्थानों के भविष्य पर असर पड़ेगा।

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