मुजफ्फरनगर में मुनिश्री सहजसागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश

मुजफ्फरनगर–जैन कनेक्ट संवाददाता | मुजफ्फरनगर स्थित श्री 1008 नेमीनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में सोमवार को आध्यात्मिक उल्लास का अद्वितीय दृश्य देखने को मिला, जब श्री 108 प्रसन्नसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री 108 सहजसागर जी महाराज ससंघ (7 पिच्छी) का भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस पावन अवसर पर जैन समाज के श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा गया। मंगलवार को शांतिधारा, अभिषेक और प्रेरणादायक प्रवचनों की दिव्य श्रृंखला चली, जिसमें गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति और आत्मकल्याण की अमूल्य शिक्षाएं दीं।

🔹 मुनिश्री का भव्य स्वागत सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा और भक्ति गीतों के साथ मुनिश्री सहजसागर जी महाराज का स्वागत किया, जिससे मंदिर परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।

🕉️ शांतिधारा व अभिषेक विधिवत सम्पन्न मंगलवार प्रातः मुनिश्री के सान्निध्य में श्री 1008 नेमीनाथ भगवान का शांतिधारा और अभिषेक अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया।

🪔 प्रवचन में अर्घ्य अर्पण की सही विधि बताई गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को अर्घ्य अर्पण की विधि समझाते हुए अष्ट द्रव्यों का महत्व और चांदी की थाली से चढ़ाने की परंपरा पर प्रकाश डाला।

🛕 मंदिर दर्शन का महत्व समझाया प्रभु के दर्शन के समय मन को केवल भगवान में केंद्रित रखने की बात कही और भक्ति भाव से ओतप्रोत पंक्तियां सुनाईं।

🙏 दीक्षा के भाव जगाने की प्रेरणा गुरुदेव ने दीक्षा आयोजनों में भाग लेने की प्रेरणा दी और कहा कि ऐसी भावना रखें कि “जैसे इन्हें दीक्षा मिली है, वैसी ही मुझे भी प्राप्त हो।”

⛰️ शाश्वत तीर्थों का महत्व बताया श्री सम्मेद शिखरजी और अयोध्या जी का उल्लेख करते हुए इनके आध्यात्मिक महत्व को श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत किया।

समय प्रबंधन पर विशेष जोर गुरुदेव ने कहा कि व्यापार या व्यस्तता के बावजूद कुछ समय प्रभु दर्शन और आत्मचिंतन के लिए जरूर निकालना चाहिए।

🍽️ श्रद्धालु को नियम दिलाया गया अशोक कुमार जैन को अष्टमी और चतुर्दशी को दो बार अन्न ग्रहण करने का नियम एक वर्ष के लिए दिलाया गया, जिसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

🗣️ प्रवचन के अंत में मां जिनवाणी स्तुति प्रवचन का समापन मां जिनवाणी की भावपूर्ण स्तुति से हुआ, जिससे समस्त वातावरण भक्तिमय हो उठा।

🫶 श्रद्धालुओं में उत्साह व भक्ति का संचार पूरे आयोजन के दौरान जैन समाज के सभी वर्गों में विशेष उत्साह, श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।

इस पावन आयोजन ने जैन समाज को न केवल धार्मिक रूप से जागरूक किया, बल्कि आत्मिक उन्नयन की प्रेरणा भी दी। मुनिश्री सहजसागर जी महाराज के प्रवचनों से श्रद्धालुओं को धर्म के प्रति नया दृष्टिकोण और साधना के प्रति नवीन संकल्प प्राप्त हुआ।

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