पूना के जैन स्थानक में उप प्रवर्तिनी साध्वी डॉ. प्रियदर्शना महाराज का देवलोकगमन

पूना – जैन कनेक्ट संवाददाता | जैन समाज की महान तपस्विनी, उप प्रवर्तिनी साध्वी डॉ. प्रियदर्शना (छोटे बाईजी महाराज) ने पूना के कोथरूढ़ जैन स्थानक में शुक्रवार शाम 3:45 बजे अपने 68 दिवसीय संथारे की पूर्णता के साथ देह त्याग किया। श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य डॉ. शिवमुनि महाराज की आज्ञानुवर्ती रही साध्वीश्री का यह जीवन समर्पण, तप और आत्मसाधना का अनुपम उदाहरण रहा। 86 वर्ष की आयु में भी साध्वीश्री ने 16 मार्च 2025 को पूर्ण जागरूकता में संथारा स्वीकार कर यह दिखा दिया कि जैन परंपरा में त्याग और तप ही सर्वोच्च आदर्श हैं।

🕊️ शांतिपूर्वक हुआ देवलोकगमन साध्वी डॉ. प्रियदर्शना ने पूना के कोथरूढ़ स्थानक में संथारे के 68वें दिन शांति से देह त्याग किया।

🧘‍♀️ संपूर्ण जागृति में लिया संथारा उन्होंने 16 मार्च को जागरूक अवस्था में स्वेच्छा से संथारा व्रत धारण किया था।

📿 प्रतिदिन हुआ मंगलपाठ साध्वीश्री के मुखारविंद से श्रद्धालु प्रतिदिन मंगलपाठ श्रवण कर रहे थे, जिससे स्थानक वातावरण भक्तिमय बना रहा।

🕯️ डोल यात्रा का आयोजन उनकी अंतिम यात्रा (महाप्रयाण डोल यात्रा) शुक्रवार सुबह 9 बजे कोथरूढ़ स्थानक से प्रारंभ होकर मोक्ष धाम तक जाएगी।

🌸 विराट श्रद्धांजलि यात्रा महाप्रयाण यात्रा में हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है, जो पुण्यात्मा को अंतिम विदाई देंगे।

🕯️ मुखाग्नि मोक्ष धाम पर साध्वीश्री की पार्थिव देह को मोक्ष धाम पर अंतिम संस्कार हेतु मुखाग्नि दी जाएगी।

📖 आध्यात्मिक प्रेरणा का जीवन साध्वीश्री का संपूर्ण जीवन संयम, साधना और सेवा को समर्पित रहा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है।

🎓 शिक्षा और साधना का अद्भुत संगम डॉ. प्रियदर्शना न केवल साध्वी थीं, बल्कि विदुषी और शिक्षाविद् भी थीं, जिन्होंने जैन धर्मशास्त्र को जन-जन तक पहुंचाया।

🌼 पूरे जैन समाज में शोक की लहर उनके महाप्रयाण की खबर से पूना समेत देशभर के जैन समुदाय में गहरा शोक व्याप्त है।

🙏 साध्वीश्री को भावभीनी श्रद्धांजलि जैन समाज सहित विभिन्न धार्मिक संस्थाओं ने साध्वी डॉ. प्रियदर्शना को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।

साध्वी डॉ. प्रियदर्शना का देवलोकगमन जैन समाज के लिए अपूरणीय क्षति है, परंतु उनका संथारा और साधना का जीवन आत्मकल्याण का मार्ग दर्शाता है। यह महाप्रयाण त्याग, संयम और मोक्ष की परंपरा का जीवंत उदाहरण है।

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