57 की उम्र में रोडीज़ की शेरनी बनी अशु जैन : एक प्रेरणादायक दास्तान

देहरादून-जैन कनेक्ट संवाददाता | कभी गृहिणी रहीं अशु जैन ने 57 साल की उम्र में वह कर दिखाया, जो समाज अक्सर असंभव मानता है। वह न केवल एक फिटनेस आइकन और इंस्टाग्राम इंफ्लुएंसर (@not.just.a.grandma) बनीं, बल्कि अब MTV रोडीज़ जैसे यंगस्टर-सेन्ट्रिक शो की प्रतिभागी भी हैं। उम्र, जिम्मेदारियों और सामाजिक धारणाओं की बेड़ियों को तोड़ते हुए अशु ने यह साबित किया है कि सपने पूरे करने की कोई उम्र नहीं होती।

👇 आइए जानते हैं अशु जैन की अद्भुत यात्रा के प्रेरणादायक पहलुओं को

🌟 घरेलू जीवन से नए अध्याय की शुरुआत 57 वर्षीय अशु कभी पारंपरिक भूमिका में थीं—एक पत्नी, मां और देखभाल करने वाली। लेकिन 54 की उम्र में उन्होंने खुद को फिर से खोजा।

📚 उम्र नहीं, जज्बा मायने रखता है 44 की उम्र में बच्चों के कहने पर उन्होंने पढ़ाई दोबारा शुरू की—MTech की डिग्री के बाद IIT दिल्ली से PhD पूरी की, वो भी 53 की उम्र में।

💪 सेहत की चेतावनी बनी प्रेरणा 2022 में ब्लड प्रेशर बढ़ने के बाद डॉक्टर ने जीवनभर की दवाओं का सुझाव दिया। अशु ने इसे चुनौती के रूप में लिया और नेचुरल फिटनेस पर ध्यान देना शुरू किया।

🏋️ 50 की उम्र के बाद शुरू हुआ फिटनेस सफर ऑनलाइन क्लास से शुरुआत कर, 2.5 साल बाद जिम ज्वॉइन किया। आज वह डेडलिफ्ट से लेकर रनिंग तक हर चीज में माहिर हैं।

📱 सोशल मीडिया पर मिली पहचान @not.just.a.grandma हैंडल से शुरू किए गए फिटनेस वीडियो आज हजारों को प्रेरित कर रहे हैं। वह दिखाती हैं कि दादी भी सुपरवुमन हो सकती हैं।

🎥 MTV रोडीज़ में मिली नई पहचान दिल्ली में पहली ऑडिशन में सफलता नहीं मिली, लेकिन हैदराबाद में दूसरी कोशिश रंग लाई और वह रोडीज़ सीज़न 20 के लिए चुनी गईं।

🏃 कोच ने बनाई रोडीज़ की तैयारी अशु के कोच लखविंदर सिंह ने उन्हें जम्पिंग, रनिंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से तैयार किया ताकि वह फिजिकली शो के लिए पूरी तरह सक्षम रहें।

🎉 दिवाली छोड़कर सपने चुने ऑडिशन दिवाली के दौरान थे। त्योहार छोड़ने का अपराधबोध हुआ, लेकिन बच्चों ने उन्हें सपनों के पीछे भागने का समर्थन दिया।

👨‍👩‍👧 परिवार बना सबसे बड़ा cheer squad पति, बच्चे, नाती-पोतों से लेकर मां तक—सभी ने हर कदम पर उनका साथ दिया। उनके आत्मविश्वास ने पूरे परिवार को प्रेरित किया।

🧘 ड्यूटी और ड्रीम्स के बीच संतुलन उन्होंने समाज की उस धारणा को तोड़ा कि मां को खुद के लिए कुछ नहीं करना चाहिए। “सेल्फ-केयर सबसे बड़ा योगदान है,” वह कहती हैं।

यह कहानी केवल एक महिला की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है जो उम्र, परिस्थितियों या सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर अपने सपनों को जीना चाहता है। अशु जैन की यात्रा यह बताती है कि ‘दादी’ का टैग अब कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति का प्रतीक हो सकता है।

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